होशदार होय रहो मुसाफिर

 होशदार होय रहो मुसाफिर
होशदार होय रहो मुसाफिर,
कजाक' फिरता गली गली ||टेक।।
इस नगरी में तीन चोर बसत हैं,
जाये पाँचों से खबर करी ।
ताके बीच ठगन बन चौकस,
लेत खबर तेरी घरी घरी ||१||
इस नगरी में दस दरवाजे,
खिरकी जामें नवी परी ।
नया दुवार नवी है खिरकी,
अंत समय की सुध बिसरी ॥२॥
जब जम आवै यह सराय में,
पात पात तोहि लूट लई ।
जबरदस्त भटियार पचीसों,
छीन लेय तेरी सिर गठरी ॥३॥
जिन सोया तिन मूल गंवाया,
जागा तिनकी राह भली ।
कहें कबीर निशा मतवाले,
भोर भया उठ मिला जुली ॥४॥

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