जिनकी रहनी अपार जगत में

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जिनकी रहनी अपार जगत में

जिनकी रहनी अपार जगत में,

सोई सतनाम पियारा हो ।।टेक।।

जैसे पुरइन' रहे जल भीतर,

जलही में करत पसारा हो।

वाके पत्र नीर नहीं ब्यापे,

ढरकि जात जल पारा हो ॥१||

जैसे सूर चढ़े रन ऊपर,

बांध सकल हथियारा हो।

वाकी सुरति रहे लड़ने में,

प्रेम मगन ललकारा हो ॥२॥

जैसे सती जरे पिय के संग,

पिया वचन नहिं टारा हो।


आप तरे औरन को तारे,

तारे कुल परिवारा हो ॥३॥

ऐसी रहन सो साधु कहावै,

आतम तत्व बिचारा हो ।

कहें कबीर सुनों भाई साधो,

पहुंचे गुरू का प्यारा हो ||४||

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